लिबास का चयन और सहजता

Reena Khatoon
First published on In Plainspeak

एक बार फिर से आज लिखने का मौका मिला है बहुत सोचा के क्या लिखूं क्योंकि मुददा ही इतना रोचक है यौनिकता व पहनावा जिस पर लिखने के लिये हमारे आसपास बहुत कुछ है।

वैसे तो पहनावा पुरुष व महिला दोनों के बीच सामाजिक भेद को वैधता प्रदान करता हैं! परन्तु महिलाओं का पहनावा ना केवल फैशन बल्कि कामुकता के नाम पर भी नियंत्रण किया जाता है! धीरे धीरे इसी कारण से कपड़े एक महिला के अच्छा या बुरा होने का वाचक बन गए हैं। नैतिकता को यौन नैतिकता के मामले में पूरी तरह से लागू किया जाता है! क्योंकि कपडे शरीर के इतने नजदीक होते हैं, शायद इसीलिए हम भी कपडो के हिसाब से अपने व्यावहार में परिवर्तन लाते हैं! जैसे स्कर्ट पहनकर या ड्रेस पहनकर लडकियों को एक विशेष तरिके से ही बैठने के लिये हिदायत दी जाती है। आपका पहनावा आपके समुदाय को भी प्रस्तुत करता है! साथ ही कपडों के माध्यम से नम्रता, यौन मुखरता, इनकार और ख़ुशी व आनंद को सांकेतिक शब्दों में बदलते हैं।

लेकिन पहनावे से जुडी नैतिक पुलिसिंग व लैंगिक भेदभाव को लेकर एक लंबा इतिहास रहा है। जहां पुरुषों के लिये उनका पहनावा उनके सामाजिक स्टेटस को दिखाता है वहीँ दूसरी ओर महिलाओ के लिये उनके पहनावे को लेकर मानदंड एकदम अलग है! जोकि महिलाओं के पहनावे के तरिके की निंदा करते हुए एक व्यक्तिगत पसंद पर नैतिक निर्णय बनाते हैं! भारत में कई राज्यों में महिलाएँ या लडकियां कुछ खास तरह के कपड़े नहीं पहन सकती है या फिर मैं ये कहूंगी कि ऐसे कपडे जिसमें वो ज्यादा आकर्शित लगती हों! जबकि पुरुष वही तंग जींस पहन सकते हैं पारदर्शी शर्ट पहनते हैं और धोती पहन सकते हैं! 

तथाकथित समाज के नियमों के हिसाब से महिलाएँ घर की इज्जत होती हैं और वो अगर घर की दहलीज लांघ रहीं है तो घर की इज्जत को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर होती है! अब बात होती है कि कैसे महिलायें इस इज्जत को बचा कर रख सकती हैं! जिसमें सबसे पहली बात होती है कि आपका पहनावा क्या है क्योंकि नियम के हिसाब से एक महिला क्या पहनकर घर के बाहर निकल रही है यह बात बहुत महत्तवपूर्ण भुमिका निभाती है! कि वह कितनी सुरक्षित है! एक महिला कभी भी किसी से ये मांग नहीं रख सकती हैं कि आज मैने कुछ अलग पहना है और मै सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हूँ! हमेशा समाज के ठेकेदार ही तय करते हैं कि एक महिला कब सुरक्षित है और कब नहीं! साथ ही एक महिला का पहनावा उसके परिवार, समाज, समुदाय व धर्म को प्रस्तुत करता है और हम सभी इस बात से भी अच्छे से वाकिफ़ हैं। ये सारे नियम महिलाओं ने नहीं बनाए है ये नियम पितृसत्तामक समाज के द्वारा बनाए गये है और मेरे हिसाब से तो एक और मज़ेदार पहलू यह भी है कि यही लोग ना केवल एक महिला के लिये घर के बाहर क्या पहनावा होगा तय करते हैं परन्तु घर के अन्दर एक महिला क्या पहनेंगी यह भी तय करते हैं जबकि इनके हिसाब से घर के अन्दर तो सुरक्षा का भी कोई मुददा नहीं है! 

दूसरी बात यह कि जब लोग ये कहकर आपको चुप कराने की कोशिश करते हैं कि यदि किसी महिला ने छोटे या तंग कपडे पहने है तो वह सुरक्षित नहीं है, उनके लिए  मेरा सवाल है कि क्या पूरे कपड़े पहनने वाली महिलाएँ सुरक्षित हैं! नहीं,  जो महिलायें सूट, साड़ी या बुर्का पहनती हैं उनके साथ भी यौनिक हिंसा होती है, वह भी उतनी ही असुरक्षित हैं जितनी कि एक स्कर्ट पहनने वाली लडकी! 

इसी सुरक्षा के नाम पर हाल ही में चंडीगढ प्रशासन ने एक सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान को नियंत्रित करने के लिये एक निति बनाई है जिसके अनुसार कोई महिला किसी सार्वजनिक जगह पर छोटे कपड़े पहनकर नहीं जा सकती हैं या फिर अगर किसी विज्ञापन में महिलाएँ कम कपड़ों में दिखाई जाती है तो प्रशासन कमेटी उस व्यावसाय को बन्द करवा सकती है। इस निति के बाद चंडीगढ में महिलाएँ छोटे कपड़े पहनकर सार्वजनिक जगहों पर या क्लबों में नहीं जा सकेंगी! 

पष्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायत के द्वारा लडकियों के पहनावे को लेकर गाँव के लिये नियम बनाना, और जींस पहनने पर पाबंदी लगाना आम बात है। छोटे कपड़ों की बात तो भूल ही जाइये क्योंकि उनके हिसाब से अगर लडकियों जींस पहनती हैं या तंग कपड़े पहनती हैं तो इससे लडको को बढावा मिलता है और वह उनकी और आकर्शित होते है और छेड़छाड़ बढ़ती है। मुझे याद है कि जब मैं अपने गाँव में रह रही थी मेरे गाँव की सारी युवा लडकियां केवल सूट सलवार पहनती थी परन्तु छेड़छाड़ की घटनाएँ तब भी होती थीं और उससे लडकियों के लिये नियमों को और सख्त कर दिया जाता था! वर्तमान में वहां पर बहुत कुछ बदला है परन्तु लडकियों के पहनावे को लेकर आज भी कुछ नहीं बदला है! शहरों में उनके छोटे कपड़े पहनने को हिंसा का कारण माना जाता है और ग्रामीण क्षेत्रों में जींस को लेकर इतना विवाद है!

मै पिछले 3 साल से साउथ दिल्ली के एक मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रह रही हूँ! इस क्षेत्र में जहा पर एक बडा केन्द्रीय विश्वविध्यालय भी है! मै हर रोज आते जाते कई सारी युवतियों को देखती हूँ और मैने पाया कि ज्यादातर लड़कियां जब अपने शहर या गाँव से यहाँ आती हैं वो हिजाब या बुर्का नहीं पहनती है परन्तु धीरे धीरे या तो वो हिजाब पहनना शुरू कर देती हैं और या बुर्का! अब बात होती है कि ये तो चयन और इच्छा का मसला है पर मेरा मानना है कि यह व्यवहार चयन या इच्छा से कहीं ज्यादा निर्भर होता है कि आप अपने आपको एक अच्छी लडकी की श्रेणी में रखना चाहती है या फिर नहीं! पर मैने यह भी देखा है कि भले ही बुर्का पहन रहीं है पर नीचे जीन्स या शॉर्ट्स पहनती हैं और फिर थोडा दूर जाकर बुर्का उतार देती हैं! जब ये बात मै अपनी एक दोस्त से साझा कर रही थी तो उसने बताया कि एक लडकी जो एक नामचीन युनिवर्सिटी में पढ रही थी और बेहद जहीन थी परन्तु केवल अपने पहनावे को लेकर शिक्षकों के द्वारा परेशान की जाती थी! तो ऐसे में जब आपको अपने पहनावे के हिसाब से आलोचित किया जाता है और एक विषेश श्रेणी में डाला जाता है तो आप कितना चुनौति देने के लिये तैयार करेंगे। 

कई बार मुझे स्वयं छोटे कपडों का चयन करते वक्त सोचना पडता है या असहजता महसूस होती है क्योंकि एक तो आमतौर पर आप महिला हो तो आपके तंग, छोटे या ऐसे कपड़े जो आपकी यौनिकता को दर्शाते हैं, नहीं पहनने चाहिये और अगर आप पहन रहें है तो छेड़छाड़ को बढावा देने वालों में गिने जाते हैं और आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल आपकी हो जाती है! और यदि आप किसी समुदाय या धर्म विशेष से जुडे हो तो आपके पहनावे को संवेदनषीलता और भी बढ़ जाती है! क्योकि आप जब यौनिकता से जुडे बाकी नियमों को तोड़ते हो तो सीधे तौर पर कम दिखाई देते हैं पर जब आप अपने पहनावे को अपनी इच्छा के हिसाब से बदलते हैं तो यह साफ़ तौर पर दिखाई देता है! इन तीन सालों में मुझे कई बार अलग अलग लोगों ने राय दी कि मुझे दुपटटा डालना चाहिये! मज़ेदार बात यह भी कि इस दौरान मुझे कई बार लोगों ने अपना घर किराये पर देने के लिये मना कर दिया और मेरे एक दोस्त ने मुझे सलाह दी कि मुझे घर देखने के लिये सूट पहनकर ही जाता चाहिये! 

मेरा मानना यह है कि यह मैं क्या पहन रही हूँ और क्या नहीं यह तय करने का अधिकार केवल मुझे है और यह केवल मेरे पहनावे के अधिकार मुददा नहीं है बल्की यह यह मेरे लिये चयन के अधिकार की बात है! और अगर मैं अपने सुविधा के हिसाब से व मर्जी एसे कपडे पहनती हूँ जो मुझे पसन्द है और जिन्हें पहनकर मैं आत्मविश्वास महसूस करती हूँ तो किसी को क्यों परेशानी होनी चाहिये और अगर किसी को परेशानी है भी तो यह उनका व्यक्तिगत मसला है मेरा नहीं! किसी दूसरे व्यक्ति की सुविधा के हिसाब से मैं क्यों अपने पहनावे को बदलूं!

Reena Khatoon is the Programme Manager of The Butterfly Project at The YP Foundation.