आत्मसात

By Toshi Pandey:

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पिछले साल की सर्दियां मेरे लिए ज़बरदस्त बदलाव लाने वाली थी। ये सर्दियाँ मुझे मुझसे मिलाने वाली साबित हुई। मैंने मेरा अस्तित्व पाया। मैं हमेशा से लाउड और एक्स्त्रोवेर्ट हूँ और मेरे बहुत दोस्त रहे है। फैमिली भी बहुत सपोर्ट करने वाली है, ख़ास कर पापा। इस बात में भी कोई दोराय नही है की समाज के पितृ सत्ताम्क ढांचे के बावजूद मेरी परवरिश बहुत बेहतरीन रहीं। समाज की जो भी प्रिवलेज हो सकती थी मेरे पास थी - अपर कास्ट प्रिवलेज वूमन। पर कुछ था जो अधूरा था। मेरा पूरा परिवार अल्ट्रा राईट है तो मैंने अपने अलावा घर की और लड़कियों की ज़िंदगी बेहद करीब से देखी है, उनकी ज़िंदगी का बस एक मकसद है, शादी। मैं भी शायद ऐसे ही होती, पर बचपन के एक हादसे ने मेरी जिंदगी का रुख बदल दिया। मै ९ साल की थी जब मेरे चाचा ने मुझे खूब प्यार किया, इतना की कई बार खून भी आ जाता। मेरे लिए ये नार्मल सा हो गया था, पर ११ साल की उम्र आते आते मै इस प्यार से थक गयी, और विरोध शुरू किया। यह मेरा पहला विरोध था। मैं पूरी ताकत से चिल्लाई। मेरी आवाज़ सुनकर पापा दौड़ कर आए, और उन्होंने बहुत कसकर अपने भाई को मारा। मैंने पापा को पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। उनकी आँखों में आंसू थे। हम जॉइंट फैमिली में थे तो यह बात बहुत दूर तक नही गयी, पर मैं अब दूर तक जाने वाली थी।
पापा ने पहली किताब लाकर दी - गाँधी की आत्म कथा, सत्य के प्रयोग. मेरे ऊपर इसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। पर मेरी टीनएज बहुत अजीब हो गयी थी। मुझे सेक्स के बारे में, यहाँ तक की कौन कौन सी जगह छुने पर मैं excite होती हूँ, सब पता था, जो मेरी उम्र की बाक़ी लड़कियों के लिए असमान था। मुझे स्कूल में लडकियों को देर तक घूरना पसंद था; मुझे उनके शरीर की बनावट भी अच्छी लगती थी। पर मेरे अलावा ऐसा कोई और नहीं सोचता था, तो मुझे लगा मैं बीमार हूँ। तब मैंने इस एहसास को दबाना शरू कर दिया, और सिसजेंडर हेटरोसेक्सुअल

फीमेल (cisgender heterosexual female) की तरह जीना शुरू कर दिया। पर मैं हमेशा से जानती थी की मैं बाईसेक्सुअल हूँ।
स्कूल के बाद शुरू हुआ यूनिवर्सिटी का सफ़र। यूनिवर्सिटी मेरे लिए नया महासमुद्र थी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी अपने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है, पर बहुत कम लोग जानते है की इस युनिवर्सिटी का क्वियर कनेक्शन भी है, वो भी बेहद ख़ूबसूरत. फिराक गोरखपुरी, उर्दू के महान शायर, गोरखपुरी गे थे। यह बात मुझे भी कुछ समय पहले ही पता चली। मैं यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट यूनियन की पॉलिटिक्स में एक्टिव थी और घर की परम्परा के उल्टे लेफ्ट पॉलिटिक्स का हिस्सा बन गयी। इस स्पेस ने मुझे अपनी आवाज़ बुलंद करना सिखाया, साथ ही मेरे मन का मैल जो ऊँची जाती के घमंड का था, धोने में मदद की। मैं पूरी ज़िंदगी अपने दोस्तों की शुक्रगुज़ार रहूंगी जिनमे साक्षी, शालू, आयुष्य, अंकित, विकास, झरना प्रमुख हैं।
इन लोगों ने मुझे जीने का नया सलीका सिखाया। साल २०१५ में क्रेट की परीक्षा में धांधली हुई, जिसके चलते मैं भी उस आन्दोलन में शामिल थी। वहीं एक बेहद खूबसूरत आँखों वाला बन्दा बैठा था, बेहद मासूम। मैं युनिवर्सिटी में लोगो से बात करने से कतराती हूँ, क्योंकि मेरी इमेज भी बहुत पॉजिटिव नहीं है। मुँहफट् होने के अपने नुक़सान है। उस लड़के को खोज कर मैंने मैसेज किया, तुम बहुत क्यूट हो। उसका जवाब आया ‘शुक्रियां’। एक लम्बी बातचीत और दिल्ली प्राइड के बाद उसने मुझे बताया की वो गे है। मेरे दिमाग में सबसे पहली बात यही आई की फिराक लौट आयें है, और वो लड़का है धर्मेश। उसने मुझे नयी ज़िंदगी दी और मैंने उसे नयी शब्दावलियाँ बताई। इन सभी चीजों के दौरान मैंने भी कन्फेस किया की मुझे लड़कियां पसंद है और मैंने यह बात सभी को बताई। सभी से बहुत पॉजिटिव रेस्पॉन्स मिला, यहाँ तक कि मेरे रिसर्च गाइड ने भी बहुत पॉजिटिव रेस्पॉन्स दिया।

आज इस बात को एक साल हो गया है और मैं अब खुद को पोल्यामरेस जेंडरफ्लूइड पैनसेक्सुअल (polyamorous gender-fluid pansexual) मानती हूँ और इलाहाबद की क्वियर कम्युनटी के लिए काम कर रही हूँ। मैंने और धर्मेश ने मिलकर रक्स RAQS (resistive alliance for queer solidarity) की शुरुआत की, जो कि मेंटल केयर एंड सेक्सुअल अब्यूज पर काम कर रही हैं। मेरी कहानी आसान रही क्योंकि मुझे सही समय पर सही दोस्त मिल गये, और जो पुराने दोस्त थे उन्होंने भी पॉजिटिव रेस्पोंसे दिया। इसके साथ ही मैंने खुद को तब जाना जब मैं पहले ही कहीं स्थापित हूँ और जहाँ से समाज और लोगों की राय बिलकुल महत्वपूर्ण नहीं थी। मैं अपने ग्रेजुएशन के दिनों से ही फेमिनिस्ट थी, अब क्वीयर फेमिनिस्ट हूँ। बीच में मेंटल हेल्थ इशू भी हुए, पर वो भी अपने दोस्तों की मदद से सही करने में लगी हूँ। मैं पलट कर पुरानी तोषी को देखती हूँ और आज को देखती हूँ तो पाती हूँ की मैं अब ज़्यादा बेहतर हूँ, खुश हूँ, कॉन्फ़िडेंट हूँ, और अपने गोल्स को लेकर स्पष्ट हूँ। अपनी कम्युनिटी के दोस्तों धर्मेश, फ़राज़, प्रतीक, निघत, और बाक़ी सभी का तहे दिल से शुक्रियां अदा करती हूँ।

मैं पैटरिअर्की (patriarchy) को तोड़ने और फाँसिवादी ताकतों के खिलाफ अपनी मुट्ठी ताने खड़ी हूँ, और खड़ी रहूँगी। 

तू ही नावाकिफ़-ऐ- अंदाज़े गुलामी है अभी 
रक्स तो जंजीरें पहेन के भी किया जाता हैं

- हबीब जालिब

सतरंगी सलाम!!!

Toshi Pandey is a Research Scholar in Allahabad University.

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